
कोरबा– करतला के किसान नवाचार लाकर न सिर्फ अपनी आजीविका को सुदृढ़ कर रहे हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी एक मिसाल कायम कर रहे हैं। उनका यह कदम यह सिद्ध करता है कि जैविक खेती केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि सतत विकास की दिशा में एक अनिवार्य कदम है। करतला क्षेत्र में नाबार्ड के जीवा कार्यक्रम के तहत 7 गांवों के 361 किसान प्राकृतिक खेती की बागडोर संभाल चुके हैं।यह पहल न केवल खेती की लागत को घटा रही है, बल्कि जमीन की उर्वरता, फसल की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर डाल रही है।
नाबार्ड ने जीवा (जैविक कृषि) योजना के तहत स्थानीय किसानों को प्रशिक्षण, बीज, तथा जैविक उर्वरकों की आपूर्ति की। इस दौरान किसानों को पारंपरिक रसायनों की जगह अपने खुद के द्वारा तैयार किए गए जीवाअमृत का प्रयोग करने की सलाह दी गई। जीवाअमृत मुख्यत: गोबर, गोमूत्र, बेसन और गुड़ का मिश्रण है, जिसे सरल प्रक्रिया से घर में ही तैयार किया जा सकता है। जैविक उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किया गया जीवाअमृत मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को सक्रिय कर देता है, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम की उपलब्धता बढ़ती है। किसानों के अनुसार, जीवाअमृत डालने के बाद फसल की वृद्धि तेज़, पत्ता हरा-भरा और रोग प्रतिरोधक क्षमता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है. किसान बताते है की पहले यू.डी.ए.पी. (यूरिया) पर निर्भर थे, अब जीवाअमृत से फसल का उपज बढ़ गया है, साथ ही कीटों की समस्या भी काफी घट गई। फसल पर कीट या रोग लगने पर किसानों ने परंपरागत एवं प्रभावी उपाय अपनाए हैं.नीम की का पाउडर, गोमूत्र, लाल मिर्च, हल्दी आदि को मिलाकर तैयार की गई मिश्रण को फसलों मे डाला जाता है। ये उपाय न केवल कीटों को मारते हैं, बल्कि फसल की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक शक्ति को भी बढ़ाते हैं।रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर खर्च में कटौती के कारण किसानों की लागत में कमी आई है। कम लागत पर ज्यादा उपज मिलने से फसल का मुना$फा भी बढ़ा है। साथ ही जैविक रूप से उगाए गए अनाज, दालें और सब्जियां बिना रसायनिक अवशेष के उपभोग के योग्य हैं जिससे स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा। जानकारों के मुताबिक जैविक फसल में विटामिन, मिनरल और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा अधिक होती है, जिससे शरीर को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
